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राजयोग

2026-10-13 · Pacific Gyan · 8 min read

On this page1. राजयोग का दार्शनिक आधार: सांख्य और योग2. चित्त, वृत्तियाँ और चित्त की भूमियाँचित्त के चार अंग (अन्तःकरण चतुष्टय)चित्त की पाँच भूमियाँ (अवस्थाएँ)चित्त की पाँच वृत्तियाँ (Thoughts/Modifications)3. पतंजलि का अष्टांग योग (आठ अंगों की गहन व्याख्या)(क) यम (नैतिकता और समाज के प्रति आचरण)(ख) नियम (व्यक्तिगत आत्म-अनुशासन)(ग) आसन (स्थिरता का विज्ञान)(घ) प्राणायाम (प्राण और मन का नियमन)(ङ) प्रत्याहार (इंद्रियों का प्रत्यावर्तन)अंतरंग साधना (संयम: धारणा, ध्यान, समाधि)(च) धारणा (Concentration)(छ) ध्यान (Meditation)(ज) समाधि (Absorption)4. समाधि के प्रकार और सर्वोच्च अवस्था (कैवल्य)1. संप्रज्ञात समाधि (सबीज समाधि)2. असंप्रज्ञात समाधि (निर्बीज समाधि)5. योग के विघ्न (अंतराय) और उनके समाधानसमाधान:6. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 6): व्यावहारिक दिशा-निर्देश

राजयोग सनातन अध्यात्म का वह मार्ग है जो मन, चित्त, प्राण और चेतना के आंतरिक रूपांतरण का प्रत्यक्ष विज्ञान प्रस्तुत करता है। यदि कर्मयोग हाथों की, भक्तियोग हृदय की और ज्ञानयोग बुद्धि की साधना है, तो राजयोग इन सभी के नियंत्रक—'चित्त' (चेतना) पर पूर्ण स्वराज्य स्थापित करने का मार्ग है।

इसे समग्रता से समझने के लिए महर्षि पतंजलि के 'पातञ्जल योगसूत्र', श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (आत्मसंयम योग) और हठयोग प्रदीपिका के अंतर्संबंधों का विस्तृत अध्ययन अनिवार्य है।


1. राजयोग का दार्शनिक आधार: सांख्य और योग

राजयोग का दर्शन महर्षि कपिल के सांख्य दर्शन पर आधारित है। सांख्य के अनुसार सृष्टि दो मूल तत्वों से बनी है:

  • पुरुष: विशुद्ध, अकर्ता, निर्लेप और अनंत चेतना (आत्मा)।
  • प्रकृति: जड़ जगत, जिसमें शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और तीनों गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) शामिल हैं।

जब पुरुष अज्ञानवश स्वयं को प्रकृति (शरीर-मन) के साथ एकाकार मान लेता है, तब वह सुख-दुःख के चक्र में बंध जाता है। राजयोग का एकमात्र उद्देश्य है—पुरुष (आत्मा) को प्रकृति (चित्त) के आवरण से अलग करके उसके मूल स्वरूप में स्थित करना (कैवल्य/मोक्ष)।

पतंजलि का पहला आधार-सूत्र इसी की घोषणा करता है:

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ (योगसूत्र 1.2) तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ (योगसूत्र 1.3) (चित्त की वृत्तियों का रुक जाना ही योग है; तब द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।)


2. चित्त, वृत्तियाँ और चित्त की भूमियाँ

राजयोग को समझने से पहले उस 'मनोभूमि' को समझना आवश्यक है जिस पर साधना की जाती है।

चित्त के चार अंग (अन्तःकरण चतुष्टय)

  1. मन: संकल्प और विकल्प करने वाला (यह करूँ या वह करूँ)।
  2. बुद्धि: निर्णय लेने और विवेक करने वाली शक्ति।
  3. अहंकार: 'मैं' और 'मेरा' का भाव (अहम्-भाव)।
  4. चित्त: स्मृतियों, संस्कारों और पूर्व अनुभवों का भंडार।

चित्त की पाँच भूमियाँ (अवस्थाएँ)

व्यास भाष्य के अनुसार चित्त की पाँच दशाएँ होती हैं:

  • क्षिप्त (Restless): रजोगुण की अधिकता; मन अत्यंत चंचल, भटकता हुआ और अस्थिर रहता है।
  • मूढ़ (Lethargic): तमोगुण की अधिकता; आलस्य, प्रमाद, अज्ञान और निद्रा में डूबा हुआ मन।
  • विक्षिप्त (Distracted): सत्त्व का प्रभाव तो होता है, पर रजोगुण के कारण कभी शांत तो कभी पुनः चंचल हो जाता है (साधारण साधकों की अवस्था)।
  • एकाग्र (One-pointed): सत्त्वगुण की प्रधानता; मन लंबे समय तक किसी एक ध्येय पर स्थिर रहने लगता है।
  • निरुद्ध (Completely Absorbed): समस्त वृत्तियों का लय हो जाना; यहाँ केवल संस्कार शेष रहते हैं या वे भी दग्ध-बीज हो जाते हैं। यह राजयोग की चरम अवस्था है।

चित्त की पाँच वृत्तियाँ (Thoughts/Modifications)

वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—क्लिष्ट (दुःख देने वाली/बंधनकारी) और अक्लिष्ट (साधना में सहायक/मुक्तिदायी):

  1. प्रमाण: यथार्थ ज्ञान के साधन (प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम/शास्त्र)।
  2. विपर्यय: मिथ्या ज्ञान (जैसे रस्सी को साँप समझ लेना)।
  3. विकल्प: शब्द सुनकर कल्पना करना, जिसका वस्तुतः कोई अस्तित्व न हो।
  4. निद्रा: तमोगुण के आलम्बन से होने वाली शून्यता की वृत्ति।
  5. स्मृति: भोगे हुए विषयों का चित्त पर पुनः उभरना।

3. पतंजलि का अष्टांग योग (आठ अंगों की गहन व्याख्या)

अष्टांग योग राजयोग की व्यावहारिक सीढ़ी है। पहले पाँच अंग बहिरंग साधना (बाह्य जीवन और शरीर का शुद्धिकरण) हैं, और अंतिम तीन अंग अंतरंग साधना (विशुद्ध चेतना का विज्ञान) कहलाते हैं।

(क) यम (नैतिकता और समाज के प्रति आचरण)

बिना नैतिक शुद्धता के मानसिक एकाग्रता संभव नहीं है। यम पाँच हैं:

  • अहिंसा: मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी को कभी पीड़ा न पहुँचाना। अहिंसा सिद्ध होने पर व्यक्ति के समक्ष हिंसक प्राणी भी अपना वैर त्याग देते हैं ("अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः"—2.35)।
  • सत्य: यथार्थ और दूसरों के हितकारी वचनों का प्रयोग। सत्य प्रतिष्ठित होने पर साधक के वचन फलित होने लगते हैं (वाक-सिद्धि)।
  • अस्तेय: चोरी न करना; मानसिक रूप से भी किसी अन्य की वस्तु को हड़पने की इच्छा न रखना।
  • ब्रह्मचर्य: वीर्य और प्राण ऊर्जा की रक्षा कर उसे ऊर्ध्वगामी बनाना, जिससे आध्यात्मिक ओज (तेज) विकसित होता है।
  • अपरिग्रह: अनावश्यक वस्तुओं, भोग-सामग्रियों और विचारों का संग्रह न करना।

(ख) नियम (व्यक्तिगत आत्म-अनुशासन)

ये साधक के व्यक्तिगत जीवन के पाँच नियम हैं:

  • शौच: बाह्य शरीर की सफाई तथा आंतरिक मन के काम, क्रोध, लोभ आदि का प्रक्षालन।
  • संतोष: वर्तमान स्थिति में जो प्राप्त है, उसमें पूर्ण प्रसन्नता; अतिरिक्त की लालसा न होना।
  • तप: साधना के मार्ग में आने वाले द्वंद्वों (गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास, मान-अपमान) को शांत रहकर सहना।
  • स्वाध्याय: उपनिषद, गीता आदि मोक्ष-शास्त्रों का अध्ययन और निरंतर आत्म-अवलोकन।
  • ईश्वर-प्रणिधान: अपने अहंकार और समस्त कर्मों को परम चेतना (ईश्वर) के प्रति पूर्णतः समर्पित कर देना।

(ग) आसन (स्थिरता का विज्ञान)

पतंजलि शारीरिक कसरतों को आसन नहीं कहते; उनका सूत्र है:

स्थिरसुखमासनम्॥ (योगसूत्र 2.46) (जिस स्थिति में शरीर बिना हिले-डुले, स्थिर और सुखपूर्वक देर तक बैठ सके, वही आसन है।)

प्रयत्न की शिथिलता (प्रयत्नशैथिल्य) और अनंत चेतना पर ध्यान लगाने से आसन सिद्ध होता है। आसन सिद्ध होने पर शरीर पर शीतोष्ण आदि द्वंद्वों का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

(घ) प्राणायाम (प्राण और मन का नियमन)

श्वास और मन का गहरा संबंध है। जब मन उत्तेजित होता है, श्वास तेज होती है; जब श्वास धीमी होती है, मन शांत हो जाता है:

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥ (योगसूत्र 2.49) (आसन सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोक देना/नियंत्रित करना प्राणायाम है।)

  • पूरक: श्वास भीतर खींचना।
  • कुंभक: श्वास को रोकना (आभ्यंतर या बाह्य)।
  • रेचक: श्वास बाहर छोड़ना। प्राणायाम से बुद्धि का प्रकाश ढंकने वाला अज्ञान का पर्दा क्षीण होने लगता है।

(ङ) प्रत्याहार (इंद्रियों का प्रत्यावर्तन)

इंद्रियों (आँख, कान, जिह्वा आदि) का स्वभाव बाहर के विषयों की ओर दौड़ना है। प्रत्याहार वह अवस्था है जहाँ इंद्रियों को बाह्य विषयों से खींचकर चित्त के स्वरूप में विलीन कर दिया जाता है—जैसे कछुआ संकट देखकर अपने समस्त अंगों को अपने खोल में समेट लेता है।


अंतरंग साधना (संयम: धारणा, ध्यान, समाधि)

जब धारणा, ध्यान और समाधि एक ही विषय पर एक साथ केंद्रित होते हैं, तो पतंजलि उसे 'संयम' कहते हैं।

(च) धारणा (Concentration)

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥ (योगसूत्र 3.1) चित्त को किसी एक निश्चित स्थान (जैसे आज्ञा चक्र, अनाहत चक्र, नासिकाग्र, या ईश्वर की मूर्ति/प्रतीक) पर बांध देना धारणा है। यहाँ मन बार-बार भटकता है और साधक उसे खींचकर वापस लाता है।

(छ) ध्यान (Meditation)

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥ (योगसूत्र 3.2) धारणा के उसी केंद्र पर विचारों का बिना किसी बाधा के अखंड प्रवाह होना ध्यान है। जैसे एक पात्र से दूसरे पात्र में तेल डालने पर धार टूटती नहीं (तैलधारवत्), वैसे ही चित्त की वृत्ति निरंतर ध्येय में बनी रहती है।

(ज) समाधि (Absorption)

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥ (योगसूत्र 3.3) जब ध्यान इतना गहरा हो जाए कि साधक का अपना अस्तित्व (कि 'मैं ध्यान कर रहा हूँ') शून्य हो जाए, और केवल ध्येय वस्तु ही प्रकाशित रहे, तो उसे समाधि कहते हैं।


4. समाधि के प्रकार और सर्वोच्च अवस्था (कैवल्य)

राजयोग में समाधि दो मुख्य चरणों में घटित होती है:

1. संप्रज्ञात समाधि (सबीज समाधि)

यहाँ किसी आलम्बन (आधार या बीज) पर ध्यान टिका रहता है। इसके चार सूक्ष्म स्तर हैं:

  • सवितर्क व निर्वितर्क: स्थूल पदार्थों या रूपों पर विचार के साथ और विचार से परे एकाग्रता।
  • सविचार व निर्विचार: सूक्ष्म तत्वों (तन्मात्राओं, प्रकृति) पर एकाग्रता।
  • सानंद: इंद्रियों और बुद्धि से परे केवल विशुद्ध सात्त्विक आनंद का अनुभव।
  • सास्मित: केवल विशुद्ध 'अहम्' (अस्मिता/होने का भाव) शेष रहना।

इस अवस्था के शिखर पर 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' (परम सत्य से भरी प्रज्ञा) का उदय होता है।

2. असंप्रज्ञात समाधि (निर्बीज समाधि)

जब समस्त वृत्तियों के साथ-साथ ज्ञान और आनंद की सूक्ष्म वृत्तियाँ भी शांत हो जाती हैं, और संस्कारों के बीज भी जलकर भस्म (दग्ध-बीज) हो जाते हैं, तब इसे 'निर्बीज समाधि' कहते हैं। यहाँ पुरुष (आत्मा) अपने विशुद्ध, एकाकी और शाश्वत स्वरूप में स्थापित हो जाता है—यही कैवल्य (पूर्ण मोक्ष) है।


5. योग के विघ्न (अंतराय) और उनके समाधान

महर्षि पतंजलि ने साधना मार्ग में आने वाली 9 मानसिक बाधाओं का स्पष्ट उल्लेख किया है:

  1. व्याधि (रोग): शारीरिक अस्वस्थता।
  2. स्त्यान (अकर्मण्यता): मानसिक भारीपन या कार्य करने की अनिच्छा।
  3. संशय (संदेह): अपनी क्षमता या मार्ग की सत्यता पर शक।
  4. प्रमाद (लापरवाही): साधना के नियमों की उपेक्षा।
  5. आलस्य (सुस्ती): शरीर और चित्त का भारीपन।
  6. अविरति (विषयासक्ति): मन का पुनः सांसारिक भोगों की ओर भागना।
  7. भ्रांतिदर्शन (गलत समझ): भ्रमित ज्ञान को सत्य मान लेना।
  8. अलब्धभूमिकत्व (असफलता): साधना में उच्च अवस्था का प्राप्त न होना।
  9. अनवस्थितत्व (अस्थिरता): प्राप्त हुई उच्च अवस्था पर टिक न पाना।

समाधान:

  • एकतत्त्वाभ्यास: किसी एक ही तत्व, गुरु-मंत्र या साधना पर निष्ठापूर्वक टिके रहना।
  • चित्त प्रसादन के चार सूत्र (योगसूत्र 1.33):
  • मैत्री: सुखी लोगों के प्रति मित्रता का भाव।
  • करुणा: दुःखी लोगों के प्रति दया और सेवा।
  • मुदिता: पुण्यात्माओं के प्रति प्रसन्नता।
  • उपेक्षा: दुष्ट या पापी व्यक्तियों के प्रति उदासीनता (क्रोध या घृणा न करना)।

6. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 6): व्यावहारिक दिशा-निर्देश

गीता राजयोग को एक संन्यासी की कठोरता से निकालकर गृहस्थ और सामान्य साधक के दैनिक जीवन से जोड़ती है:

  • आसन की मर्यादा: आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा; कुशा, मृगछाला और वस्त्र से ढका हुआ पवित्र स्थान हो।
  • युक्त जीवनशैली:

    युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ (गीता 6.17) संतुलित भोजन, नियमित दिनचर्या, कर्मों में संतुलन, और संतुलित सोना-जागना ही योग को सिद्ध करता है।

  • मन को वश में करने के दो उपाय:

  • अभ्यास: मन जब-जब भटके, उसे धैर्यपूर्वक पकड़कर पुनः आत्मा में लगाना।
  • वैराग्य: संसार के नश्वर सुखों के प्रति आसक्ति का क्षय।

राजयोग अंधविश्वास नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना की प्रयोगशाला है। यह किसी बाहरी ईश्वर पर केवल विश्वास करने की माँग नहीं करता, बल्कि व्यक्ति को यह विधि देता है कि वह स्वयं भीतर उतरकर सत्य का साक्षात परीक्षण कर सके। जब प्राण, मन और बुद्धि शांत हो जाते हैं, तो साधक अपने ही भीतर उस परम चैतन्य का साक्षात्कार कर लेता है जो जन्म-मरण और समस्त बंधनों से परे है।

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